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सोमवार, 1 नवंबर 2010

स्नेह-निर्झर बह गया है! – सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

स्नेह-निर्झर बह गया है!
रेत ज्यों तन रह गया है।

आम की यह डाल जो सुखी दिखी,
कह रही है-"अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ-"
        जीवन दह गया है।

दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,
किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल;
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल-
ठाट जीवन का वही
        जो ढह गया है।

अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा।
बह रही है हृदय पर केवल अमा;
मै अलक्षित हूँ; यही
        कवि कह गया है।    – सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

11 टिप्‍पणियां:

  1. यह तो निराला जी की प्रसिध्द कविता है इसे फिरसे पढवाने का आभार ।

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  2. सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला ' जी की कलम को शत शत नमन। धन्यवाद इस इसे पढवाने के लिये।

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  3. नई-नई संवेदनाओं, भावों को सहज और आकर्षक रूप में कविता के रूप में ढालने में निराला का कोई जवाब नहीं...काश आज के दौर में भी हमें कोई निराला मिल पाता...उनकी कविताओं का मर्म हर बार नया और गहरे चोट करने वाला इसलिए होता था क्योंकि वे जो लिखते थे वही जीते भी थे..

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  4. पंकज जी,कविता पढवाने के लिए धन्यवाद |

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  5. बहुत दिन बाद पढ़ी निराला जी की एक बेहतरीन कृति।...धन्यवाद

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  6. सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला ' जी की पावन स्मृतियों को प्रणाम

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  7. कई बार पढ़ने की बाद भी इस कविता को दुबारा पढने का जी करता है.

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  8. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  9. संजय जी : आप इस कविता को संगीतबद्ध भी जरूर सुनिए ... धन्यबाद ...और आभार हमारे चिट्ठे पर आने का

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  10. भाव प्रवणता से ओतप्रोत

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