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रविवार, 11 जुलाई 2010

तुमुल कोलाहल कलह में / कामायनी - जयशंकर प्रसाद

 तुमुल कोलाहल कलह में मैं ह्रदय की बात रे मन
विकल होकर नित्य चचंल, खोजती जब नींद के पल,
चेतना थक-सी रही तब, मैं मलय की बात रे मन

चिर-विषाद-विलीन मन की, इस व्यथा के तिमिर-वन की लृ
मैं उषा-सी ज्योति-रेखा, कुसुम-विकसित प्रात रे मन

जहाँ मरु-ज्वाला धधकती, चातकी कन को तरसती,
उन्हीं जीवन-घाटियों की, मैं सरस बरसात रे मन

पवन की प्राचीर में रुक जला जीवन जी रहा झुक,
इस झुलसते विश्व-दिन की मैं कुसुम-श्रृतु-रात रे मन

चिर निराशा नीरधार से, प्रतिच्छायित अश्रु-सर में,
मधुप-मुखर मरंद-मुकुलित, मैं सजल जलजात रे मन। जयशंकर प्रसाद (कामायनी)


"कामायनी" के "निर्वेद" सर्ग का यह अमोल गीत संगीतबद्ध किया था एस.डी.बर्मन ने और अपना स्वर दिया आशा जी ने, सुनाने के लिए नीचे के लिंक पर जाएँ
http://ww.smashits.com/music/devotional/play/songs/9645/love-tunes-on-clarinet-master-ebrahim/80131/tumul-kolahal-kalah-mein.html

4 टिप्‍पणियां:

  1. साथ में सन्दर्भ भी देते बन्धु , जैसे कौन सा सर्ग आदि ...!

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  2. अमरेन्द्र जी! यह गीत निर्वेद सर्ग का है ... धन्यबाद यहाँ आने के लिए और आपके सुझाव के लिए...

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  3. bahut achchha ji ye panktiyaan vaastik jivan ko prerit karne waali hai aati sundar

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