भावतारंगिनी में ढूँढें

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं – 'अज्ञेय'

साँप !
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछूँ .. (उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना?
        विष कहाँ पाया?       – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

कोई टिप्पणी नहीं:

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी टिप्पणियाँ व सुझाव हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं

हाल के पोस्ट

पंकज-पत्र पर पंकज की कुछ कविताएँ

पंकज के कुछ पंकिल शब्द