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शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

वर दे, वीणावादिनि वर दे। – सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे।

काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।

नव गति नव लय ताल छंद नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।

वर दे, वीणावादिनि वर दे।   – सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'


1 टिप्पणी:

  1. निराला जी की बात ही निराली। धन्यवाद इस रचना को पढवाने के लिये।

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