रविवार, 10 अक्टूबर 2010

मिट्टी से व्यर्थ लड़ाई है / डॉ. हरिवंशराय बच्चन / आकुल अंतर


नीचे रहती है पावों के,
सिर चढ़ती राजा-रावों के,
अंबर को भी ढ़क लेने की यह आज शपथ कर आई है।
मिट्टी से व्यर्थ लड़ाई है।

सौ बार हटाई जाती है,
फिर आ अधिकार जमाती है,
हा हंत, विजय यह पाती है,
कोई ऐसा रंग-रूप नहीं जिस पर न अंत को छाई है।
मिट्टी से व्यर्थ लड़ाई है।

सबको मिट्टीमय कर देगी,
सबको निज में लय कर देगी,
लो अमर पंक्तियों पर मेरी यह निष्प्रयास चढ़ आई है।
मिट्टी से व्यर्थ लड़ाई है।    - (आकुल अंतर, १९४३)

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

रक्तमुख - जानकीवल्लभ शास्त्री

कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो
पथ निर्देशक वह है,
लाज लजाती जिसकी कृति से
धृति उपदेश वह है

मूर्त दंभ गढ़ने उठता है
शील विनय परिभाषा,
मृत्यू रक्तमुख से देता
जन को जीवन की आशा

जनता धरती पर बैठी है
नभ में मंच खड़ा है,
जो जितना है दूर मही से
उतना वही बड़ा है     - जानकीवल्लभ शास्त्री


साभार: कविताकोश

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा – गोपाल सिंह 'नेपाली'

बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा

दो दिन के रैन बसेरे की,
हर चीज़ चुराई जाती है
दीपक तो अपना जलता है,
पर रात पराई होती है
गलियों से नैन चुरा लाए
तस्वीर किसी के मुखड़े की
रह गए खुले भर रात नयन, दिल तो दिलदारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा

शबनम-सा बचपन उतरा था,
तारों की गुमसुम गलियों में
थी प्रीति-रीति की समझ नहीं,
तो प्यार मिला था छलियों से
बचपन का संग जब छूटा तो
नयनों से मिले सजल नयना
नादान नये दो नयनों को, नित नये बजारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा

हर शाम गगन में चिपका दी,
तारों के अक्षर की पाती
किसने लिक्खी, किसको लिक्खी,
देखी तो पढ़ी नहीं जाती
कहते हैं यह तो किस्मत है
धरती के रहनेवालों की
पर मेरी किस्मत को तो इन, ठंडे अंगारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा

अब जाना कितना अंतर है,
नज़रों के झुकने-झुकने में
हो जाती है कितनी दूरी,
थोड़ा-सी रुकने-रुकने में
मुझ पर जग की जो नज़र झुकी
वह ढाल बनी मेरे आगे
मैंने जब नज़र झुकाई तो, फिर मुझे हज़ारों ने लूटा
मेरी दुल्हन-सी रातों को नौ लाख सितारों ने लूटा    – गोपाल सिंह 'नेपाली'

साभार: कविताकोश
चित्र: विकीमीडिया

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

'द्वान्दगीत' के कुछ छंद पढ़िए - राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर'

राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर उनके द्वारा रचित 'द्वन्दगीत' के कुछ छंद आपके समक्ष रखना चाहूँगा

ये द्वन्दयुद्ध हम सभी  मन में होता है जैसे कुछ विचार प्रेरित करते युद्धभूमि में कूदने को, कुछ सचेत करते हैं और भयक्रांत करते हैं, कुछ विचार प्रेम में समर्पण की राह दिखाते हैं वहीँ कुछ विचार विचारने करने को कहते हैं यह पंक्ति "जिनको मस्तक का मोह नहीं, उनकी गिनती नादानों में" बहुतों को अच्छी लगी हों क्योंकि यही  सत्य है, यथार्थ है , पर नहीं भी है..क्योंकि यह नहीं होना चाहिएपर ऐसा हो रहा है "जिनको मस्तक का मोह नहीं, उनकी गिनती नादानों में" ही होती है  ...
प्रस्तुत हैं कुछ छंद जिनका मैं आप लोगों के साथ पुनर्पाठ करना चाहूँगा :-

जिनमें बाकी ईमान, अभी वे भटक रहे वीरानों में,
दे रहे सत्य की जाँच आखिरी दमतक रेगिस्तानों में।
ज्ञानी वह जो हर कदम धरे बचकर तप की चिनगारी से,
जिनको मस्तक का मोह नहीं, उनकी गिनती नादानों में।

अब उसी द्वन्दयुद्ध की कुछ प्रेरणात्मक पंक्तियों को देखिये:

पी ले विष का भी घूँट बहक, तब मजा सुरा पीने का है,
तनकर बिजली का वार सहे, यह गर्व नये सीने का है।
सिर की कीमत का भान हुआ, तब त्याग कहाँ? बलिदान कहाँ?
गरदन इज्जत पर दिये फिरो, तब मजा यहाँ जीने का है।

और उसी कलम की कुछ निश्चिन्त पंक्तियाँ :

तू जीवन का कंठ, भंग इसका कोई उत्साह न कर,
रोक नहीं आवेग प्राण के,सँभल-सँभल कर आह न कर।
उठने दे हुंकार हृदय से,जैसे वह उठना चाहे;किसका,
कहाँ वक्ष फटता है,तू इसकी परवाह न कर।

उसी "द्वन्दगीत" कि कुछ और पंक्तियाँ:

दिये नयन में अश्रु, हॄदय में भला किया जो प्यार दिया,
मुझमें मुझे मग्न करने को स्वप्नों का संसार दिया।
सब-कुछ दिया मूक प्राणों की वंशी में वाणी देकर,
पर क्यों हाय, तृषा दी,उर में भीषण हाहाकार दिया?

और इन पंक्तियों में जगती को फूंकने की बात इस तरह से कह रहे हैं :

विभा, विभा, ओ विभा हमें दे, किरण! सूर्य! दे उजियाली।
आह! युगों से घेर रही मानव-शिशु को रजनी काली।
प्रभो! रिक्त यदि कोष विभा का तो फिर इतना ही कर दे;
दे जगती को फूँक, तनिक झिलमिला उठे यह अँधियाली।

और उसी रचना में दिनकर जी कवि के बारे में कहते हैं:

मेरे उर की कसक हाय,तेरे मन का आनन्द हुई।
इन आँखों की अश्रुधार ही तेरे हित मकरन्द हुई।
तू कहता ’कवि’ मुझे, किन्तु,आहत मन यह कैसे माने?
इतना ही है ज्ञात कि मेरी व्यथा उमड़कर छन्द हुई।

अब देखिये कैसा मीठा छंद है ये :
 दो अधरों के बीच खड़ी थी भय की एक तिमिर-रेखा,
आज ओस के दिव्य कणों में धुल उसको मिटते देखा।
जाग, प्रिये! निशि गई, चूमती पलक उतरकर प्रात-विभा,
जाग,लिखें चुम्बन से हम जीवन का प्रथम मधुर लेखा।

छंद यह भी उसी द्वन्दगीत का :
जीवन ही कल मृत्यु बनेगा, और मृत्यु ही नव-जीवन,
जीवन-मृत्यु-बीच तब क्यों द्वन्द्वों का यह उत्थान-पतन?
ज्योति-बिन्दु चिर नित्य अरे, तोधूल बनूँ या फूल बनूँ,
जीवन दे मुस्कान जिसे, क्यों उसे कहो दे अश्रु मरण?

मैं भी हँसूँ फूल-सा खिलकर? शिशु अबोध हो लूँ कैसे?
पीकर इतनी व्यथा, कहो, तुतली वाणी बोलूँ कैसे?
जी करता है, मत्त वायु बन फिरूँ; कुंज में नृत्य करूँ,
पर, हूँ विवश हाय, पंकज का हिमकण हूँ, डोलूँ कैसे?

औ’ रोना भी व्यर्थ, मृदुल जब हुआ व्यथा का भार नहीं,
आँसू पा बढ़ता जाता है, घटता पारावार नहीं;
जो कुछ मिले भोग लेना है, फूल हों कि हों शूल सखे!
पश्चाताप यही कि नियति पर हमें स्वल्प अधिकार नहीं।

पत्थर ही पिघला न, कहो करुणा की रही कहानी क्या
टुकड़े दिल के हुए नहीं, तब बहा दृगों से पानी क्या?
मस्ती क्या जिसको पाकर फिर दुनिया की भी याद रही?
डरने लगी मरण से तो फिर चढ़ती हुई जवानी क्या?

ठोकर मार फोड़ दे उसको जिस बरतन में छेद रहे,
वह लंका जल जाय जहाँ भाई - भाई में भेद रहे।
गजनी तोड़े सोमनाथ को, काबे को दें फूँक शिवा,
जले कुराँ अरबी रेतों में, सागर जा फिर वेद रहे।

छोड़े पोथी-पत्र, मिला जब अनुभव में आह्लाद मुझे,
फूलों की पत्ती पर अंकित एक दिव्य संवाद मुझे;
दहन धर्म मानव का पाया, अतः, दुःख भयहीन हुआ;
अब तो दह्यमान जीवन में भी मिलता कुछ स्वाद मुझे।

पहली सीख यही जीवन की,अपने को आबाद करो,
बस न सके दिल की बस्ती,तो आग लगा बरबाद करो।
खिल पायें, तो कुसुम खिलाओ,नहीं? करो पतझाड़ इसे,
या तो बाँधो हृदय फूल से, याकि इसे आजाद करो।

पूजा का यह कनक - दीप खँडहर में आन जलाया क्यों?
रेगिस्तान हृदय था मेरा, पाटल - कुसुम खिलाया क्यों?
मैं अन्तिम सुख खोज रहा था तप्त बालुओं में गिरकर।
बुला रहा था सर्वनाश को यह पीयूष पिलाया क्यों?

पी चुके गरल का घूँट तीव्र, हम स्वाद जीस्त का जान चुके,
तुम दुःख, शोक बन-बन आये, हम बार-बार पहचान चुके।
खेलो नूतन कुछ खेल, देव! दो चोट नई, कुछ दर्द नया,
यह व्यथा विरस निःस्वाद हुई, हम सार भाग कर पान चुके।

बाँसुरी विफल, यदि कूक-कूक मरघट में जीवन ला न सकी,
सूखे तरु को पनपा न सकी,मुर्दों को छेड़ जगा न सकी।
यौवन की वह मस्ती कैसी जिसको अपना ही मोह सदा?
जो मौत देख ललचा न सकी, दुनिया में आग लगा न सकी।

धरती से व्याकुल आह उठी, मैं दाह भूमि का सह न सका,
दिल पिघल-पिघल उमड़ा लेकिन, आँसू बन-बनकर बह न सका।
है सोच मुझे दिन-रात यही, क्या प्रभु को मुख दिखलाऊँगा?
जो कुछ कहने मैं आया था, वह भेद किसी से कह न सका।

चाँदनी बनाई, धूप रची, भूतल पर व्योम विशाल रचा,
कहते हैं, ऊपर स्वर्ग कहीं, नीचे कोई पाताल रचा।
दिल - जले देहियों को केवल लीला कहकर सन्तोष नहीं;
ओ रचनेवाले! बता, हाय! आखिर क्यों यह जंजाल रचा?

सम्पुटित कोष को चीर, बीज-कण को किसने निर्वास दिया
किसको न रुचा निर्वाण? मिटा किसने तुरीय का वास दिया?
चिर-तृषावन्त कर दूर किया जीवन का देकर शाप हमें,
जिसका न अन्त वह पन्थ, लक्ष्य-सीमा-विहीन आकाश दिया।

जो सृजन असत्, तो पूण्य-पाप का श्वेत - नील बन्धन क्यों है?
स्वप्नों के मिथ्या - तन्तु - बीच आबद्ध सत्य जीवन क्यों है?
हम स्वयं नित्य, निर्लिप्त अरे, तो क्यों शुभ का उपदेश हमें?
किस चिन्त्य रूप का अन्वेषण? यह आराधन-पूजन क्यों है?

हर घड़ी प्यास, हर रोज जलन, मिट्टी में थी यह आग कहाँ?
हमसे पहले था दुखी कौन? था अमिट व्यथा का राग कहाँ?
लो जन्म; खोजते मरो विफल; फिर जन्म; हाय, क्या लाचारी
!हम दौड़ रहे जिस ओर सतत, वह अव्यय अमिय-तड़ाग कहाँ?

और अब देखिये श्रृष्टि को क्या कह गए दिनकर जी:

गत हुए अमित कल्पान्त, सृष्टि पर, हुई सभी आबाद नहीं,
दिन से न दाह का लोप हुआ, निशि ने छोड़ा अवसाद नहीं।
बरसी न आज तक वृष्टि जिसे पीकर मानव की प्यास बुझे,
हम भली भाँति यह जान चुके तेरी दुनिया में स्वाद नहीं।

हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़े, दृष्टि-पथ से छिपता आलोक गया,
सीखा ज्यों-ज्यों नव ज्ञान, हमें मिलता त्यों-त्यों नव शोक गया।
हाँ, जिसे प्रेम हम कहते हैं, उसका भी मोल पड़ा देना,
जब मिली संगिनी, अदन गया, कर से विरागमय लोक गया।

भू पर उतरे जिस रोज, धरी पहिले से ही जंजीर मिली,
परिचय न द्वन्द्व से था, लेकिन, धरती पर संचित पीर मिली।
जब हार दुखों से भाग चले, तब तक सत्पथ का लोप हुआ,
जिसपर भूले सौ लोग गये, सम्मुख वह भ्रान्त लकीर मिली।

तिल-तिलकर हम जल चुके, विरह की तीव्र आँच कुछ मन्द करो,
सहने की अब सामर्थ्य नहीं, लीला - प्रसार यह बन्द करो।
चित्रित भ्रम-जाल समेट धरो, हम खेल खेलते हार चुके,
निर्वाषित करो प्रदीप, शून्य में एक तुम्हीं आनन्द करो।  रामधारी सिंह 'दिनकर'

अब आगे मैं चाहूँगा की आप राष्ट्रकवि दिनकर जी को उनके जन्म-दिवस पर समर्पित मेरी कवितांजलि  भी देखें : http://pankaj-patra.blogspot.com/2010/09/dinkar-ji-ko-prakash-pankaj-kavitanjali.html 

 

शनिवार, 11 सितंबर 2010

सरहद के पार से / रामधारी सिंह 'दिनकर' / सामधेनी


जन्मभूमि से दूर, किसी बन में या सरित-किनारे,
हम तो लो, सो रहे लगाते आजादी के नारे।

ज्ञात नहीं किनको कितने दुख में हम छोड़ चले हैं,
किस असहाय दशा में किनसे नाता तोड़ चले हैं।


जो रोयें, तुम उन्हें सुनाना ज्वालामयी कहानी,
स्यात्, सुखा दे यह ज्वाला उनकी आँखों का पानी।

आये थे हम यहाँ देश-माता का मान बढ़ाने,
स्वतन्त्रता के महा यज्ञ में अपना हविस् चढ़ाने।


सो पूर्णाहुति हुई; देवता की सुन अन्य पुकार,
मिट्टी की गोदी तज हम चलने को हैं तैयार।

माँ का आशीर्वाद, प्रिया का प्रेम लिये जाते हैं,
केवल है सन्देश एक जो तुम्हें दिये जाते हैं।

यह झण्डा, जिसको मुर्दे की मुट्ठी जकड़ रही है,
छिन न जाय, इस भय से अब भी कस कर पकड़ रही है;

 
थामो इसे; शपथ लो, बलि का कोई क्रम न रुकेगा,
चाहे जो हो जाय, मगर, यह झण्डा नहीं झुकेगा।


इस झण्डे में शान चमकती है मरने वालों की,
भीमकाय पर्वत से मुट्ठीभर लड़नेवालों की।

इसके नीचे ध्वनित हुआ ’आजाद हिन्द’ का नारा,
बही देश भर के लोहू की यहाँ एक हो धारा।

जिस दिन हो तिमिरान्त, विजय की किरणें जब लहरायें,
अलग-अलग बहनेवाली ये सरिताएँ मिल जाएँ।


संगम पर गाड़ना ध्वजा यह, इसका मान बढ़ाना,
और याद में हम-जैसों की भी दो फूल चढ़ाना।  रामधारी सिंह 'दिनकर' (सामधेनी)

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है - रामधारी सिंह 'दिनकर' / सामधेनी

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।
चिनगारी बन गई लहू की बूँद गिरी जो पग से;
चमक रहे, पीछे मुड़ देखो, चरण - चिह्न जगमग - से।
शुरू हुई आराध्य-भूमि यह, क्लान्ति नहीं रे राही;
और नहीं तो पाँव लगे हैं, क्यों पड़ने डगमग - से?
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।
अपनी हड्डी की मशाल से हॄदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेय है शेष किसी विधि पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है,
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।
दिशा दीप्त हो उठी प्राप्तकर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलायेगी ही,
अम्बर पर घन बन छायेगा ही उच्छवास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।   रामधारी सिंह 'दिनकर' (सामधेनी)

रविवार, 15 अगस्त 2010

नमामि कमलां अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम् ।। वन्दे मातरम् । श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां धरणीं भरणीं मातरम् ।। वन्दे मातरम् ।।










वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यशामलां मातरम् ।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं
सुखदां वरदां मातरम् ।। १ ।। वन्दे मातरम् ।
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले ।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं मातरम् ।। २ ।। वन्दे मातरम् ।
तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वं हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडि
मन्दिरे-मन्दिरे मातरम् ।। ३ ।। वन्दे मातरम् ।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलां
सुजलां सुफलां मातरम् ।। ४ ।। वन्दे मातरम् ।
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
धरणीं भरणीं मातरम् ।। ५ ।। वन्दे मातरम् ।।    
बंकिम चन्द्र चटर्जी (आनंद मठ)


लता जी के स्वर मे हिंदी फिल्म "आनंद मठ" मे यह गीत सुनें :


हेमंत कुमार के स्वर मे हिंदी फिल्म "आनंद मठ" मे यह गीत सुनें :



http://www.esnips.com/doc/f858febb-6134-444f-b102-d21b8a9f2050/Vande-Mataram-Ringtone



Translation  by Shree Aurobindo


Mother, I bow to thee!  
Rich with thy hurrying streams,  
bright with orchard gleams,  
Cool with thy winds of delight,  
Dark fields waving Mother of might,  
Mother free.  

Glory of moonlight dreams,  
Over thy branches and lordly streams,  
 Clad in thy blossoming trees,  
Mother, giver of ease  
Laughing low and sweet!  
Mother I kiss thy feet,  
Speaker sweet and low!  
Mother, to thee I bow.  
  

Who hath said thou art weak in thy lands  
When the sword flesh out in the seventy million hands  
And seventy million voices roar  
Thy dreadful name from shore to shore?  
With many strengths who art mighty and stored,  
To thee I call Mother and Lord!  
Though who savest, arise and save!  
To her I cry who ever her foe-man drove  
Back from plain and Sea  
And shook herself free.  
    

Thou art wisdom, thou art law, 
Thou art heart, our soul, our breath 
Though art love divine, the awe 
In our hearts that conquers death. 
Thine the strength that nerves the arm, 
Thine the beauty, thine the charm. 
Every image made divine 
In our temples is but thine. 



Thou art Durga, Lady and Queen, 
With her hands that strike and her 
swords of sheen, 
Thou art Lakshmi lotus-throned, 
And the Muse a hundred-toned, 
Pure and perfect without peer, 
Mother lend thine ear, 
Rich with thy hurrying streams, 
Bright with thy orchard gleems, 
Dark of hue O candid-fair 

In thy soul, with jeweled hair 
And thy glorious smile divine, 
Loveliest of all earthly lands, 
Showering wealth from well-stored hands! 
Mother, mother  mine! 
Mother sweet, I bow to thee, 
Mother great and free! 

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