'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का मंथन
कुछ बिसरे कलम का मंथन
कबीर
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रविवार, 4 जुलाई 2010
रहना नहीं देस बिराना है - कबीर
रहना नहीं देस बिराना है
यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है
यह संसार काँटों की बाड़ी, उलझ उलझ मर जाना है
यह संसार झाड़ अरु झंखार, आग लगे गल जाना है
कहत कबीर सुनो भाई साधो ! सतगुरु नाम ठिकाना है ।
- कबीर
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